"युगतेवर" का साहित्यिक सफ़रनामा................डॉ0 धर्मपाल सिंह (प्रबन्ध सम्पादक-'युगतेवर' साहित्यिक पत्रिका)
आज के समय में हम जो जीवन. मूल्यों का क्षरण देख रहे हैंए चतुर्दिक् अराजकता का अँधेरा साम्राज्य छाता जा रहा हैए उससे मुक्ति किसी भी कानून से नहींए बल्कि वैचारिक परिवर्तन से ही पाई जा सकती है। चरित्र. निर्माण आज की परम आवश्यकता है । 1982 में श्री कमलनयन पाण्डेय के सम्पादन में 'तेवर' त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। 2005 तक 'तेवर' पत्रिका का प्रकाशन होता रहा । चूँकि 'तेवर' पत्रिका का पंजीयन नहीं कराया गया था | इसलिए किसी महाशय ने 'तेवर' को अपने पक्ष में पंजीकृत करा लिया। सम्भवतः 'तेवर' शीर्षक उन्हें आकर्षक लगा होगा। बहरहाल पाण्डेय जी के पास भारत के पंजीयक कार्यालयए दिल्ली से एक लेखिका का फ़ोन आया। वे 'तेवर' पत्रिका को पसन्द करती थीं। चाहती थीं कि इस पत्रिका का प्रकाशन होता रहे। ऐसे में उन्होंने 'तेवर' पत्रिका के किसी अन्य के पक्ष में पंजीकृत होने की सूचना दी। साथ ही उनका सुझाव था कि 'तेवर' के आगे.प ीछे अनुकूल शब्द जोड़कर पंजीकरण हेतु आवेदन किया जाए। तदनुसार आवेदन किया गया। फलतः 2006 में 'युगतेवर'शीर्षक से पत्रिका पंजीकृत हो गई। इस तरह 2006 से निरन्तर 'युगतेवर'त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन होता आ रहा है। 'सार्थक सृजन का साझा मंच' 'युगतेवर' का आदर्श उद्घोष है। लोकप्रतिबद्ध पत्रिका 'युगतेवर' स्थानीयता और बाज़ारवादी वैश्विकता के द्वन्द्व में स्थानीयता के साथ प्रतिबद्ध है। आज जिस तरह से अपसंस्कृतिए स्वच्छन्दतावादए असहिष्णुता का घना अँधेरा समाज को अपने आग़ोश में लेता जा रहा हैए 'युगतेवर' सांस्कृतिक. सामाजिक समरसता की भावना को अपने लेखों के द्वारा मज़बूत करने में संलिप्त है। अपने समय के सार्थक सवालों और समाज के ठोस मुद्दों को उठाना तथा जीवन.विमर्श के विविध पक्षों .पहलुओं को प्रस्तुत करना 'युगतेवर' का केन्द्रीय ध्येय है। 'युगतेवर' एक परिवर्तनकामी पत्रिका है। 'युगतेवर' परिवार का स्पष्ट मन्तव्य है कि हस्तक्षेपी और प्रतिरोधी मनःस्थिति का सृजन किये बिना सार्थक परिवर्तन की पहल सम्भव नहीं है। इसके सम्पादन में पत्रिका से जुड़े सभी साथियों से गम्भीरतापूर्वक विचार.विमर्श करके ही रचनाएँ प्रकाशित की जाती हैं। उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान के श् सरस्वती सम्मानश् के साथ इस पत्रिका को राष्ट्रीय स्तर के कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। मैं इस पत्रिका से 2005 से सक्रिय रूप से जुड़ा। अब यह पत्रिका दिन.दूनी रात.चौगुनी गति से अपनी वैचारिक यात्रा जारी रखे हुए है। अब तक इसने जो विशेषांक निकाले हैंए वे पूरे देश में पाठकों द्वारा पसन्द किये गये हैं। निम्नलिखित साहित्यिक हस्तियों पर 'युगतेवर'ने विशेषांक प्रकाशित किये हैं :- अजमल सुलतानपुरी, मजरूह सुलतानपुरी, रफीक सादानी, आद्याप्रसाद श्उन्मत्तश्, मानबहादुर सिंह, त्रिलोचन । उल्लेखनीय है कि 'युगतेवर'ने जुलाई.सितम्बर 2011 में 'गाँव' पर केन्द्रित विशेषांक प्रकाशित किया था जो बहुत ही सराहा गया। इसमें उपन्यासकार सोमेशशेखरचन्द्र का पहला उपन्यास 'गँवई. गन्ध. गुमान' प्रकाशित किया गया। खुशी की बात है कि इस उपन्यास का अँगरेज़ी रूपान्तरण अमेरिका के लब्धप्रतिष्ठ प्रकाशन द्वारा वर्ष 2021 में किया गया है। सोमेश जी की कोई रचना पहली बार 'युगतेवर'में ही प्रकाशित हुई और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। आज सोमेश जी की दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और वे साहित्य जगत् के जाने. माने नाम हैं। उनका नया उपन्यास लगभग पूरा हो चुका है। 'युगतेवर' निरन्तर उदीयमान लेखकों को प्रोत्साहित करता रहता है। आज का समय विज्ञापन का समय है। अतः हमने निश्चय किया है कि पत्रिका का प्रत्येक सम्पादकीय फ़ेसबुक पर डाला जायेगा जिससे सहृदय पाठकों को पत्रिका की विषय.वस्तु की सटीक जानकारी मिल सकेगी। आगामी अंक का सम्पादकीय नीचे है। जो लोग पत्रिका की सदस्यता चाहते होंए वे मेरे मोबाइल नम्बर 7905760378 पर सुबह 9 बजे से रात 9 बजे (गुरुवार को छोड़कर) के बीच सम्पर्क कर सकते हैं।